Sunday, 17 April 2011

छलावा


वो ज़्यादा खिलखिलाना 
वो ज़्यादा यूँ मनाना 
वो कुछ अच्छा बहाना
वो प्यारा सा तराना
छलावा छल ही जाता है !
दिखावा चुभ  भी  जाता है!!

पता है मन के कोने को
कुछ पलों का फ़साना है
पता उल्लसित से लम्हों को
बुना सा ताना बाना है
फिर भी जाने क्यूँ
छलावा छल ही जाता है!
दिखावा चुभ भी जाता है!!

गलों का हर बार मिलना 
थामना यूँ हथेली को
साथ ज्यों उम्र भर का पाना है
जो कुछ भी अच्छा कहा'
मानो सच ही माना है
पता हमको भी तुमको भी 
दो दिन का शामियाना है
छलावा छल ही जाता है!
दिखावा चुभ भी जाता है!!



4 comments:

  1. :)...........tumhare andar bhi ek baacha hai..........is baache ko kabhi marne nhi dena:)

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  2. @RISHBH hmm so toh theek hai..but is comment ka matlab is poem me samjh nai aya..:(

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  3. kya baat hai madam...maar hi dalogi tum to...great...

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